कितना स्वाभाविक है

 किसी के आने की आशा में                                                                                                                                                     ताक लगाए मै बैठा हूं 

"कौन आएगा?"
का प्रश्न
बड़ा ही स्वाभाविक जान पड़ता है
जो आएगा
उसके आने से पहले
मै उसकी कल्पना करते
उस इंसान को अपने पास
बैठा पाता हूं,
क्या ये स्वाभाविक है?
नहीं,
साथ बैठना 
स्वाभाविक नहीं 
पर उनुपस्थित होकर उपस्थित होना?
ये भी स्वाभाविक नहीं
ये तो हमेशा हमारे साथ
हमारे घट रहे अनुभव के रूप में
कहीं ना कहीं रहता है 
औऱ अभी भी घट रहा है
जब मै किसी की ताक लगाए बैठा हूं
जिसपर मुझे यकीन है
की वो नहीं आएगा


उसका नहीं आना
और मेरा प्रतीक्षा करते रहना
कितना स्वाभाविक है
नहीं?

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